मऊरानीपुर संत निरंकारी भवन मऊरानीपुर में महात्मा छेदीलाल ने सत्संग के दौरान प्रवचन करते हुए कहा कि जिन को मन वचन और कर्म से मेरी गति है, और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं। उनके हृदय कमल में, में सदा विश्राम किया करता हूं। अगर राम निरंकार दिल में समा जाए तो जीव में भक्ति की अनंत शक्ति दिखाई देने लगती है। यह वही शक्ति है जिससे अर्जुन ने कौरव दल के बड़े-बड़े योद्धाओं को धराशाई कर दिया था। उनके साथ स्वयं भगवान कृष्ण सार्थी बने। आगे महात्मा ने कहा कि हरिदेव जगत नगदेव हरी, हरितो जगतो नहीं भिन्न तनू। यानी निरंकारी ही संसार है और संसार ही निरंकार है। इस अभेद ज्ञान से अभेद शक्ति व अनन्य भक्ति हृदय मैं पैदा होती है। जिसके कारण अभेद ज्ञान से भेद भक्ति मिलती हैं। जिसके कारण मनु शत रूपा शरभंग ऋषि, दशरथ आदि ऐसी अनन्य भक्ति प्राप्त नहीं कर पाए। जैसे हनुमान जी ने प्राप्त की थी। आदर्श कृपा सर्वश्रेष्ठ अनन्य भक्ति का रहस्य राम जी हनुमान जी को इस प्रकार समझते हैं। सो अनन्य जाके असि मति न टटई हनुमंत, में सेवक सदाचार रूप स्वामी भगवंत। आर्था है कि हनुमान अनन्य भक्त वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती वह सदैव सोचा करते हैं। कि मैं सेवक हूं दास हूं। चरासर जड़ चेतन जगत मेरे स्वामी सद्गुरु भगवान है। इस परमपिता परमात्मा की कृपा से हमें मनुष्य जन्म लिया है। इस से नाता जोड़ लें। यही माता सुदीक्षा महाराज व मिशन का संदेश है। बड़े प्यार से मिल जुलकर हमें आगे बढ़ना है। इस मौके पर मुखी कृष्ण कुमार सोनी ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए उपस्थित सभी संत महात्माओं से समागम में चलने का अनुरोध किया है।
रिपोर्ट शिवम विश्वकर्मा
रिपोर्ट शिवम विश्वकर्मा

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